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Tuesday, May 12, 2009

जिंदगी की कतरनों का संबेदनात्मक चित्रण

मेरे अंदर एक इच्छा थी कि खूब पढ़ू और खूब लिखूं ताकि संपूर्ण बिहार में मेरा नाम रौशन हो। यह ख्वाहिश इसलिए थी कि कभी मैं प्राध्यापक था और लिखता था। साथ-साथ पत्रकार भी था। लिखने की आदत छात्र-जीवन से ही थी। मैं जब बी.एन. कालेज का छात्र था, तो वहां के कालेज की प्रतिवर्ष निकलने वाली पत्रिका ‘भारती’ का संपादक भी था। इसके पूर्व ‘भारती’ के संपादक के रूप में डा. जगदीश नारायण चौबे,डा. केदारनाथ कलाधर,डा. गंगेश गुंजन,अवधेश कुमार सरस आदि थे।

डा। जगदीश नारायण चौबे पटना साइंस कालेज के हिन्दी-विभाग में थे, डा. केदारनाथ कलाधर बी.एन.कालेज में, गंगेश गुंजन आकाशवाणी की सर्विस से अवकाश प्राप्त करने के पश्चात् कुछ वर्षों तक कथक-केन्द्र के निदेशक या अध्यक्ष या ऐसे ही किसी महत्वपूर्ण पद पर थे। ये सभी लिखने-पढ़ने वाले लोग भी थे। आगे मीडिया ख़बर पर।
लिंक : http://mediakhabar.com/topicdetails.aspx?mid=35&tid=992

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